पी. कुमार । रायपुर/

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर चल रहा विवाद अब केवल नेतृत्व परिवर्तन की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। पार्टी के भीतर बढ़ती हलचल के पीछे सबसे बड़ी वजह आलाकमान की स्थिति स्पष्ट नहीं होना माना जा रहा है। दीपक बैज के नेतृत्व में ही पार्टी आगे बढ़ेगी या नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा, इस पर तस्वीर साफ न होने से संगठन में असमंजस और बयानबाजी दोनों तेज हो गए हैं।

 

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पूर्व जिला अध्यक्ष को जारी कारण बताओ नोटिस के बाद सोशल मीडिया पर शुरू हुई सार्वजनिक बहस ने अंदरूनी खींचतान को खुलकर सामने ला दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि विधानसभा चुनाव में अभी लगभग ढाई वर्ष का समय शेष है, इसलिए नेतृत्व को लेकर जल्द निर्णय संगठनात्मक दृष्टि से अधिक हितकारी होगा।

 

चुनाव तैयारी के लिए स्पष्ट नेतृत्व की मांग

पार्टी के भीतर एक वर्ग का कहना है कि यदि प्रदेश अध्यक्ष बदला जाना है तो नए नेतृत्व को संगठन की जमीनी स्थिति समझने, कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ाने और बूथ स्तर तक चुनावी रणनीति तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। वहीं यदि दीपक बैज के नेतृत्व में ही आगामी चुनाव लड़ना है तो इसकी स्पष्ट घोषणा कर संगठन में चल रही अटकलों को समाप्त किया जाना चाहिए।

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2018 का मॉडल सामने रख रहे नेता

कांग्रेस नेता 2018 विधानसभा चुनाव से पहले की स्थिति का उदाहरण दे रहे हैं। उस समय भूपेश बघेल को पर्याप्त समय पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था। उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर जोर दिया, जिसका लाभ चुनाव में कांग्रेस को मिला। नेताओं का तर्क है कि समय रहते नेतृत्व तय होने पर संगठन एक दिशा में काम कर पाता है और चुनावी तैयारी अधिक प्रभावी होती है।

 

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ऐन चुनाव से पहले बदलाव के नुकसान की चर्चा

प्रदेश कांग्रेस में चुनाव से ठीक पहले नेतृत्व परिवर्तन के उदाहरण पहले भी रहे हैं। 2008 के चुनाव से करीब पांच माह पहले चरणदास महंत की जगह धनेन्द्र साहू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। 2013 के चुनाव से पहले नंदकुमार पटेल को अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन झीरम घाटी हमले के बाद चुनाव से कुछ माह पहले फिर नेतृत्व परिवर्तन करना पड़ा। 2023 के चुनाव से लगभग छह माह पहले मोहन मरकाम की जगह दीपक बैज को कमान सौंपी गई थी। पार्टी के भीतर इन उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि अंतिम समय में नेतृत्व बदलने से संगठनात्मक तैयारी प्रभावित होती है।

 

संगठनात्मक फैसलों में देरी पर भी सवाल

कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि महत्वपूर्ण संगठनात्मक निर्णयों में देरी का नुकसान पार्टी पहले भी उठा चुकी है। उनके अनुसार नए अध्यक्ष को पर्याप्त समय मिलने पर संगठन की कमजोरियों की पहचान, बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता और चुनावी रणनीति के प्रभावी क्रियान्वयन में मदद मिलती है। इसी कारण पार्टी का एक वर्ग चाहता है कि इस बार नेतृत्व को लेकर निर्णय अंतिम समय तक लंबित न रखा जाए।

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तीन साल का कार्यकाल पूरा, पर बदलाव अनिवार्य नहीं

दीपक बैज का प्रदेश अध्यक्ष के रूप में तीन वर्ष का कार्यकाल 13 जुलाई को पूरा हो चुका है, लेकिन कांग्रेस संविधान में ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है कि तीन वर्ष पूरे होते ही अध्यक्ष बदलना अनिवार्य हो। पार्टी में कम अवधि में बदलाव और लंबे कार्यकाल दोनों तरह के उदाहरण मौजूद हैं। भूपेश बघेल लगभग पांच वर्ष तक प्रदेश अध्यक्ष रहे थे।

 

यही कारण है कि मौजूदा विवाद केवल कार्यकाल पूरा होने का नहीं, बल्कि आलाकमान की आगामी रणनीति का प्रश्न बन गया है। कांग्रेस के भीतर अब सबसे बड़ी मांग यही है कि नेतृत्व को लेकर जल्द और स्पष्ट फैसला किया जाए, ताकि संगठन चुनावी तैयारी पर केंद्रित हो सके। फिलहाल आलाकमान की अनिश्चितता ही पार्टी के भीतर जारी घमासान को सबसे अधिक हवा देती दिख रही है।