नई दिल्ली। अगस्त 2015 में भारतीय क्रिकेट ने एक ऐसे दौर में प्रवेश किया, जिसने आगे चलकर टेस्ट क्रिकेट में टीम इंडिया की पहचान बदल दी। श्रीलंका के खिलाफ तीन मैचों की टेस्ट सीरीज का निर्णायक मुकाबला भारतीय क्रिकेट के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। विराट कोहली की कप्तानी में भारत ने श्रीलंका को उसी की धरती पर 117 रन से हराकर 22 साल बाद टेस्ट सीरीज जीतने का कारनामा किया। यह विदेशी सरजमीं पर 2011 के वेस्टइंडीज दौरे के बाद भारत की पहली टेस्ट सीरीज जीत भी थी।

इस ऐतिहासिक जीत की कहानी आसान नहीं थी। सीरीज का पहला मुकाबला भारत ने 63 रन से जीता था, जबकि दूसरे टेस्ट में टीम को 278 रन की करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी। ऐसे में निर्णायक मुकाबले में भारतीय टीम पर सीरीज बचाने के साथ-साथ इतिहास रचने का दबाव भी था।

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बारिश के बीच पुजारा और अमित मिश्रा ने संभाली भारतीय पारी

निर्णायक टेस्ट में श्रीलंका के कप्तान एंजेलो मैथ्यूज ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने का फैसला किया। शुरुआती तीन दिनों में बारिश ने खेल को काफी प्रभावित किया, लेकिन भारतीय बल्लेबाजों ने मुश्किल परिस्थितियों में धैर्य दिखाया।

चेतेश्वर पुजारा ने शानदार शतक जड़कर भारतीय पारी को मजबूती दी। वहीं, गेंदबाज अमित मिश्रा ने बल्ले से कमाल करते हुए 59 रन की अहम पारी खेली। इन दोनों के योगदान से भारत पहली पारी में 312 रन बनाने में सफल रहा।

जवाब में श्रीलंका की टीम भारतीय गेंदबाजों के सामने टिक नहीं सकी। ईशांत शर्मा ने अपनी लहराती गेंदों से मेजबान बल्लेबाजों को परेशान किया और पांच विकेट झटके। श्रीलंका की पहली पारी 201 रन पर सिमट गई। भारत को पहली पारी के आधार पर 111 रन की महत्वपूर्ण बढ़त मिली।

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अश्विन और ईशांत की गेंदबाजी ने दिलाई ऐतिहासिक जीत

दूसरी पारी में भारतीय टीम ने 274 रन बनाए और श्रीलंका के सामने जीत के लिए 374 रन का लक्ष्य रखा। मेजबान टीम की ओर से कप्तान एंजेलो मैथ्यूज ने शतक लगाकर मुकाबले को रोमांचक बनाने की कोशिश की, लेकिन भारतीय गेंदबाजों के सामने उनकी टीम ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी।

रविचंद्रन अश्विन ने चार विकेट और ईशांत शर्मा ने तीन विकेट झटके। श्रीलंका की पूरी टीम 268 रन पर आउट हो गई। भारत ने यह मुकाबला 117 रन से जीतकर तीन मैचों की सीरीज 2-1 से अपने नाम कर ली।

यह जीत सिर्फ एक सीरीज की सफलता नहीं थी, बल्कि भारतीय टेस्ट क्रिकेट में विराट कोहली के नेतृत्व की मजबूत शुरुआत भी थी।

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ऑस्ट्रेलिया में विराट ने दिखाया था आक्रामक तेवर

श्रीलंका में मिली इस ऐतिहासिक जीत को समझने के लिए 2014 के ऑस्ट्रेलिया दौरे को याद करना जरूरी है। बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के दौरान भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी चोटिल हो गए थे, जिसके बाद विराट कोहली को टीम की कमान सौंपी गई।

कोहली ने कप्तानी संभालते ही अपने आक्रामक अंदाज का परिचय दिया। एडिलेड टेस्ट की पहली पारी में उन्होंने शानदार 115 रन बनाए। इसके बाद दूसरी पारी में भारत के सामने 364 रन का लक्ष्य था। टीम प्रबंधन जहां मैच को ड्रॉ कराने की रणनीति पर विचार कर रहा था, वहीं विराट कोहली जीत के इरादे से मैदान पर उतरे।

मुरली विजय के साथ भारतीय पारी को आगे बढ़ाते हुए कोहली ने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों का डटकर सामना किया। विजय 99 रन बनाकर आउट हुए, लेकिन कोहली ने हार नहीं मानी। उन्होंने दूसरी पारी में 141 रन की शानदार पारी खेली और भारत को जीत के करीब पहुंचाने की कोशिश की।

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हालांकि, भारतीय टीम यह मुकाबला 48 रन से हार गई, लेकिन कोहली की आक्रामक कप्तानी और जीत के लिए खेलने की सोच ने क्रिकेट जगत को स्पष्ट संदेश दे दिया था कि भारतीय टेस्ट क्रिकेट में बदलाव आने वाला है।

हार के बावजूद बदली भारतीय क्रिकेट की सोच

एडिलेड टेस्ट के बाद महेंद्र सिंह धोनी टीम में लौटे। भारत ने ब्रिस्बेन टेस्ट गंवाया, जबकि मेलबर्न में खेला गया तीसरा मुकाबला ड्रॉ रहा। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया दौरे पर विराट कोहली की कप्तानी और बल्लेबाजी ने उनके भविष्य के नेतृत्व की झलक दिखा दी थी।

अगस्त 2015 में श्रीलंका के खिलाफ मिली जीत ने उस विश्वास को और मजबूत किया। विराट कोहली ने अपनी कप्तानी में भारतीय टीम को विदेशी धरती पर जीत का नया रास्ता दिखाया। यही वह दौर था, जिसने आगे चलकर उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि विश्व क्रिकेट के सबसे सफल टेस्ट कप्तानों में शामिल कर दिया।