नई दिल्ली। जिस पैकेटबंद खाने को लोग भूख मिटाने का आसान और सस्ता विकल्प मानकर रोजाना इस्तेमाल कर रहे हैं, वही लंबे समय में सेहत के लिए खतरा बढ़ा सकता है। इनमें जरूरत से ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट का इस्तेमाल मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोग जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ा रहा है। चिंता यह भी है कि बच्चों से लेकर बड़ों तक की रोजमर्रा की डाइट में ऐसे उत्पादों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्र सरकार अब पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर लाल चेतावनी लेबल लगाने के प्रस्ताव पर आगे बढ़ रही है। प्रस्तावित मानकों के अनुसार करीब 80 फीसदी पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक या वसा की मात्रा तय सीमा से अधिक हो सकती है। ऐसे उत्पादों के पैकेट पर स्पष्ट चेतावनी देकर उपभोक्ताओं को सचेत करने की तैयारी है।

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सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने के कारण बढ़ी खपत

भारत में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत के पीछे कम कीमत और आसान उपलब्धता बड़ी वजह है। कम आय वाले परिवारों के लिए सस्ते और तुरंत उपलब्ध खाद्य उत्पाद आकर्षक विकल्प बन जाते हैं। यही वजह है कि बड़ी कंपनियां कीमत को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने पर जोर देती हैं और ऐसे उत्पादों का बाजार लगातार विस्तार कर रहा है।

नेस्ले और यूनिलीवर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में लंबे समय से मौजूद हैं। नेस्ले ने 1912 में भारत में मीठा गाढ़ा दूध बेचना शुरू किया था, जबकि यूनिलीवर ने 1937 में डालडा बाजार में उतारा। वनस्पति तेल से बना डालडा घी के मुकाबले सस्ता विकल्प था और धीरे-धीरे घरों के साथ रेस्तरां व मिठाई की दुकानों तक पहुंच गया। इसी तरह बाद में कई पैकेटबंद खाद्य उत्पाद भारतीय बाजार का हिस्सा बनते गए।

बड़े ब्रांडों की सामग्री पर भी उठे सवाल

मोंडलेज की इंडिया यूनिट की पूर्व अधिकारी पारुल शर्मा के अनुसार, भारत में कई खाद्य उत्पादों की रेसिपी दशकों पहले कम कीमत वाले उपभोक्ता वर्ग को ध्यान में रखकर तैयार की गई थी। उनका कहना है कि लंबे समय तक भारतीय उपभोक्ताओं ने बड़े ब्रांडों के उत्पादों की गुणवत्ता और सामग्री को लेकर पर्याप्त सवाल नहीं उठाए।

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अलग-अलग देशों में एक ही ब्रांड के उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री में अंतर भी बहस का विषय रहा है। उदाहरण के तौर पर भारत में मैगी में पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है, जबकि ब्रिटेन में बिकने वाली मैगी में सूरजमुखी के तेल का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह भारत में बिकने वाली किटकैट में ऑस्ट्रेलिया में उपलब्ध उत्पाद की तुलना में कोको की मात्रा कम होने की बात कही जाती है।

नेस्ले का कहना है कि अलग-अलग देशों में उत्पादों की रेसिपी स्थानीय स्वाद, खान-पान की संस्कृति, उपलब्ध सामग्री और जलवायु को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है। कंपनी के अनुसार भारत में उसके सभी उत्पाद खाद्य सुरक्षा कानूनों के अनुरूप हैं।

अब पैकेट पर साफ दिखेगा सेहत का खतरा

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ऐसे खाद्य उत्पादों के लिए लाल चेतावनी लेबल का प्रस्ताव तैयार कर रहा है, जिनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट निर्धारित सीमा से अधिक है। ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन के मुताबिक, प्रस्तावित नियम लागू होने पर भारत में करीब 80 फीसदी पैकेटबंद खाद्य पदार्थ उच्च चीनी, नमक या वसा वाले उत्पादों के रूप में चिह्नित हो सकते हैं।

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स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पैकेट पर स्पष्ट चेतावनी उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थ खरीदने से पहले उसकी पोषण सामग्री समझने और बेहतर विकल्प चुनने में मदद कर सकती है। हालांकि खाद्य उद्योग लंबे समय से ऐसे कड़े लेबलिंग नियमों का विरोध करता रहा है। उद्योग को आशंका है कि लाल चेतावनी लेबल लगने के बाद इन उत्पादों की बिक्री पर बड़ा असर पड़ सकता है।

चिली के अनुभव से बढ़ी उम्मीद

चिली में 2016 में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर चेतावनी लेबल लागू किए गए थे। इसके बाद वहां अधिक चीनी वाले पेयों की बिक्री में करीब 24 फीसदी गिरावट दर्ज किए जाने का दावा किया गया। इसी अनुभव को देखते हुए भारत में भी चेतावनी लेबल को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं।

अब बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि पैकेटबंद खाना कितना सस्ता और सुविधाजनक है, बल्कि इस पर भी है कि लंबे समय तक इसके सेवन की कीमत उपभोक्ता अपनी सेहत से कितनी चुका सकता है।

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