भोपाल। देश के लिए 67 मेडल जीत चुके एशिया नंबर-1 पैरा आर्म रेसलर श्रीमंत आज अपनी उपलब्धियों के बावजूद नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे श्रीमंत का कहना है कि अगर सरकार या संबंधित विभाग से उन्हें नौकरी नहीं मिली, तो वे अपने जीते हुए मेडल नीलाम करने पर मजबूर हो जाएंगे।

श्रीमंत ने बताया कि खेल के सफर में उनके परिवार ने भी बड़ी कुर्बानियां दी हैं। उनकी मां ने बेटे के सपने को पूरा करने के लिए अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख दिया। प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने, यात्रा और अन्य खर्चों के लिए परिवार ने अपनी क्षमता से बढ़कर मदद की।

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67 मेडल जीतकर भी नौकरी का इंतजार

श्रीमंत ने पैरा आर्म रेसलिंग में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए अब तक 67 मेडल अपने नाम किए हैं। उनकी उपलब्धियों में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में जीते पदक भी शामिल हैं। इसके बावजूद उन्हें अब तक सरकारी नौकरी नहीं मिल सकी है।

श्रीमंत का कहना है कि खिलाड़ी जब देश के लिए मेडल जीतते हैं, तो उनका सम्मान किया जाता है, लेकिन खेल के बाद रोजगार और आर्थिक सुरक्षा को लेकर कई खिलाड़ियों को संघर्ष करना पड़ता है। वे चाहते हैं कि उनकी उपलब्धियों को देखते हुए सरकार उन्हें नौकरी का अवसर दे, ताकि वे आगे भी देश के लिए खेलते रहें।

मां ने मंगलसूत्र गिरवी रखकर दिया साथ

श्रीमंत के खेल करियर में उनकी मां का योगदान बेहद अहम रहा है। आर्थिक तंगी के बावजूद परिवार ने उनका हौसला नहीं टूटने दिया। प्रतियोगिताओं में होने वाले खर्च को पूरा करने के लिए उनकी मां ने अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख दिया।

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श्रीमंत कहते हैं कि उनके लिए ये मेडल सिर्फ ट्रॉफी या पदक नहीं हैं, बल्कि उनके परिवार के संघर्ष और त्याग की निशानी हैं। यही वजह है कि नौकरी नहीं मिलने की स्थिति में मेडल नीलाम करने की बात उनके लिए बेहद भावुक और मजबूरी भरा फैसला है।

बोले- मेडल अलमारी में रखने के लिए नहीं जीते

श्रीमंत का दर्द इस बात को लेकर है कि देश के लिए लगातार पदक जीतने के बावजूद उनके भविष्य की कोई ठोस व्यवस्था नहीं हो सकी। उनका कहना है कि उन्होंने ये मेडल सिर्फ अलमारी में सजाने के लिए नहीं जीते, बल्कि देश का नाम रोशन करने के लिए मेहनत की है।

अब उनकी मांग है कि सरकार उनकी उपलब्धियों का संज्ञान लेते हुए नौकरी और आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराए, ताकि उनका खेल करियर आगे भी जारी रह सके।

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