नई दिल्ली, 1 जून 2026। पितृत्व से जुड़े विवादों में डीएनए जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि न्याय और सत्य की खोज के लिए अदालतें आवश्यक होने पर डीएनए परीक्षण का आदेश दे सकती हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि निजता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूर्ण या असीमित अधिकार नहीं है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने छत्तीसगढ़ से जुड़े एक पितृत्व विवाद मामले में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में पितृत्व का प्रश्न विवाद का मुख्य केंद्र हो और अन्य उपलब्ध साक्ष्य पर्याप्त न हों, तब डीएनए जांच न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है।
मामले में एक व्यक्ति ने स्वयं को एक व्यक्ति का वैध पुत्र बताते हुए संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा किया था। उसकी मां का कहना था कि संबंधित व्यक्ति के साथ सहमति से बने संबंधों के कारण उसका जन्म हुआ। विवाद के समाधान के लिए अदालतों ने डीएनए परीक्षण का आदेश दिया था, जिसे चुनौती दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्यायालयों का उद्देश्य केवल कानूनी प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचना भी है। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य विवाद के निष्पक्ष समाधान में मदद करते हैं। अदालत ने यह भी माना कि निजता का अधिकार संवैधानिक रूप से संरक्षित है, लेकिन न्यायिक आवश्यकता होने पर इसे उचित सीमाओं के भीतर संतुलित किया जा सकता है।
फैसले को पितृत्व विवादों और संपत्ति संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों के निपटारे में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका और मजबूत होगी।

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