रायपुर, 21 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का सूपेबेड़ा गांव एक बार फिर सुर्खियों में है। यहां का पानी प्यास तो बुझाता है, लेकिन धीरे-धीरे किडनी भी खा रहा है*। अब *एम्स रायपुर ने इस गंभीर बीमारी को शुरुआती स्टेज में पकड़ने के लिए अनोखी पहल शुरू की है- *दांतों की जांच से किडनी के मरीज ढूंढे जाएंगे*।

क्या है नई रिसर्च: एम्स रायपुर के डेंटिस्ट्री विभाग ने ICMR को रिसर्च प्रस्ताव भेजा है। मंजूरी मिलते ही सूपेबेड़ा और पखांजूर में संयुक्त स्टडी शुरू होगी। गांव के लोगों के दांतों की बनावट, सड़न, मजबूती और फ्लोरोसिस के निशान का वैज्ञानिक विश्लेषण होगा। दांतों पर दिखने वाले सफेद-पीले धब्बे, धारियां किडनी खराब होने के शुरुआती संकेत माने जाएंगे।

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क्यों जरूरी है स्टडी: देवभोग ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रकाश साहू के मुताबिक सूपेबेड़ा के बोरवेल के पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा सामान्य से कई गुना ज्यादा है। फ्लोराइड किडनी के जरिए ही शरीर से निकलता है। ज्यादा मात्रा होने पर किडनी की फिल्टर क्षमता घटती है और क्रॉनिक किडनी डिजीज हो जाती है।

2005 से 135 मौतें: सूपेबेड़ा में 2005 से अब तक करीब 135 लोग किडनी की बीमारी से जान गंवा चुके हैं। फरवरी में ही प्रेमजय छत्रपाल नामक ग्रामीण की 6 साल डायलिसिस के बाद मौत हुई थी। फरवरी के हेल्थ कैंप में ही 15 नए किडनी मरीज मिले थे।

कैसे दिखता है फ्लोरोसिस: फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट तो दांतों के लिए अच्छा है, लेकिन पीने के पानी में ज्यादा फ्लोराइड होने से दांतों की ऊपरी परत यानी इनमेल खराब हो जाती है। दांतों पर सफेद, पीले या भूरे धब्बे, धारियां बन जाती हैं और मजबूती कम हो जाती है। यही निशान अब किडनी जांच का आधार बनेंगे।

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टेलीमेडिसिन से मिल रही मदद: एम्स का नेफ्रोलॉजी विभाग अभी टेलीमेडिसिन से सूपेबेड़ा के मरीजों का इलाज कर रहा है। पिछले डेढ़ महीने में 30 मरीजों को सुविधा मिली है। रिसर्च शुरू होने के बाद नेफ्रोलॉजी और लैब मेडिसिन विभाग संभावित मरीजों की एडवांस जांच करेंगे।

आगे का रास्ता: एम्स के कार्यकालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. अशोक जिंदल (रिटायर्ड) के माध्यम से प्रस्ताव ICMR भेजा गया है। मंजूरी मिलते ही फील्ड स्टडी शुरू होगी। एम्स किडनी रोग विशेषज्ञ प्रो. डॉ. विनय राठौर का कहना है कि *‘दांतों की एक झलक जिंदगी बचाने का जरिया बन सकती है’*।

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