दिल्ली ओबीसी क्रीमी लेयर से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिली है। मंगलवार को हुई सुनवाई में केंद्र ने 11 मार्च 2026 के आदेश के संबंध में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की, लेकिन शीर्ष अदालत ने फिलहाल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। मामले की अगली सुनवाई अब 17 सितंबर को होगी।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने मामले की सुनवाई की। केंद्र सरकार ने अदालत से 11 मार्च के फैसले में आवश्यक बदलाव अथवा उसके क्रियान्वयन से जुड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों पर विचार करने का आग्रह किया है। सरकार का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत फैसले को लागू करने से सरकारी भर्तियों और उच्च शिक्षा में प्रवेश की प्रक्रिया पर व्यापक असर पड़ सकता है।

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पुराने बैचों और सेवा व्यवस्था का दिया हवाला

इससे पहले 26 अगस्त को हुई सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि केंद्र सरकार फैसले की समीक्षा या संशोधन की मांग नहीं कर रही है। सरकार केवल पिछली तारीख से फैसले को लागू करने में आने वाली जमीनी और प्रशासनिक कठिनाइयों से अदालत को अवगत कराना चाहती है।

उन्होंने कहा था कि फैसले के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ओबीसी उम्मीदवारों के पुराने बैचों की श्रेणियों में बदलाव करना पड़ सकता है। इसके अलावा सिविल सेवाओं में कैडर, पद और सेवा संबंधी व्यवस्थाओं पर भी असर पड़ने की संभावना है।

भर्ती और प्रवेश प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है असर

केंद्र सरकार का तर्क है कि 11 मार्च के फैसले को बिना किसी नीतिगत हस्तक्षेप के लागू किया गया तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। सरकार के अनुसार इसका असर केंद्र सरकार के साथ-साथ 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में होने वाली सरकारी भर्तियों तथा उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।

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क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की वेतन आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा था कि पीएसयू बैंक या निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता के वेतन को ही आधार बनाकर उनके बच्चों को केवल अधिक आय के कारण आरक्षण के दायरे से बाहर करना उचित नहीं है।

पीठ ने माना था कि इस प्रकार का भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में निहित समानता के सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है। अब इस महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार की दलीलों और आगे की कानूनी स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट 17 सितंबर को सुनवाई करेगा।

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