रायपुर। वन विभाग के निर्माण और वानिकी कार्यों में ठेका पद्धति लागू करने के वन मुख्यालय के प्रस्ताव पर भले ही अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, लेकिन प्रस्ताव ने विभाग के भीतर विरोध की चिंगारी भड़का दी है। वन मंत्री की मंजूरी से पहले ही प्रदेश के विभिन्न जिलों में फील्ड कर्मचारियों और विभागीय संगठनों ने ठेका प्रणाली के संभावित दुष्परिणामों को लेकर मोर्चा खोल दिया है।

कर्मचारियों का कहना है कि विभागीय कार्यों को ठेके पर देने से जंगलों की सुरक्षा, वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय वनवासियों की भागीदारी प्रभावित हो सकती है। जिला संगठनों के माध्यम से मुख्य वन संरक्षकों और वनमंडलाधिकारियों को पत्र भेजकर प्रस्ताव का विरोध दर्ज कराया जा रहा है।

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ग्रामीणों से मिलने वाली सूचनाओं का तंत्र प्रभावित होने की आशंका

फील्ड में पदस्थ वन कर्मचारियों ने सवाल उठाया है कि ठेका पद्धति लागू होने के बाद स्थानीय ग्रामीणों और वनवासियों से विभाग को मिलने वाली महत्वपूर्ण सूचनाओं का सिलसिला कमजोर पड़ सकता है। जंगलों में अवैध कटाई, शिकार, आगजनी और अन्य वन अपराधों की जानकारी कई बार स्थानीय लोगों के माध्यम से ही विभाग तक पहुंचती है।

कर्मचारियों का कहना है कि यदि भविष्य में किसी वन अपराध या सुरक्षा में चूक की स्थिति बनती है तो उसकी जिम्मेदारी अंततः फील्ड कर्मचारियों पर ही डाली जा सकती है।

जंगल की आग बुझाने में भी पड़ सकता है असर

प्रदेश के जंगलों में गर्मी के मौसम के दौरान लगभग हर साल आगजनी की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय ग्रामीणों और वन सुरक्षा समितियों की मदद से आग पर काबू पाया जाता रहा है। कर्मचारियों का तर्क है कि ठेका व्यवस्था लागू होने से विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच बना सीधा संपर्क कमजोर पड़ सकता है, जिसका असर जंगल की आग जैसी आपात स्थितियों से निपटने पर भी पड़ सकता है।

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ठेका पद्धति में बाहरी मजदूरों और मशीनीकरण की भूमिका बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। कर्मचारियों को आशंका है कि जंगलों में बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ने से वन्यजीव अपराधों और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।

लागत बढ़ने और गुणवत्ता पर सवाल

फील्ड में पदस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों का दावा है कि ठेका पद्धति से कार्यों की लागत बढ़ सकती है और इसके लिए अतिरिक्त बजट की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं निर्माण और वानिकी कार्यों की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता जताई गई है।

कर्मचारियों का कहना है कि घटिया निर्माण या कार्यों में अनियमितता की स्थिति में स्थानीय स्तर पर पदस्थ कर्मचारियों को जवाबदेही के दायरे में लाया जा सकता है, जबकि ठेके के माध्यम से होने वाले कार्यों की प्रभावी निगरानी करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा।

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आंदोलन और बेमियादी हड़ताल की चेतावनी

वन कर्मचारियों ने अपने विरोध पत्रों में स्पष्ट किया है कि यदि विभागीय अमले और स्थानीय वनवासियों की भावनाओं के विपरीत ठेका पद्धति लागू करने का निर्णय लिया गया तो आंदोलन किया जाएगा। कर्मचारियों ने बेमियादी हड़ताल की चेतावनी भी दी है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति बनने पर जंगलों की सुरक्षा और विभागीय व्यवस्थाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है।

स्थानीय रोजगार और सामुदायिक भागीदारी पर भी खतरा

दरअसल, जंगलों में कूप कटाई, एएनआर, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, सीपीटी निर्माण, वॉच टावर, वन्यप्राणी रेस्क्यू और कैम्पा से जुड़े कई कार्यों में स्थानीय वनवासियों को रोजगार मिलता है। इन कार्यों में ग्रामीणों, वनाश्रित परिवारों और वन सुरक्षा समितियों की सक्रिय भागीदारी रहती है।

स्थानीय स्तर पर रोजगार और मजदूरी मिलने से वनवासियों का जंगल और वन विभाग से सीधा जुड़ाव बना रहता है। कर्मचारियों का मानना है कि ठेका पद्धति लागू होने पर यह सामुदायिक सहभागिता कमजोर हो सकती है, जिसका सीधा असर वन संरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर पड़ सकता है।

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फिलहाल वन मुख्यालय के प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय का इंतजार है, लेकिन उससे पहले ही प्रदेशभर में उभर रहे विरोध ने विभाग के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।