धनतेरस का पर्व इस बार 6 और 7 नवंबर को मनाया जाएगा। दोनों दिन पूजा और खरीदारी के लिए डेढ़-डेढ़ घंटे के चार मुहूर्त बताए गए हैं। इस तरह श्रद्धालुओं को कुल 12 घंटे का शुभ समय मिलेगा। धनतेरस पर सोना-चांदी, बर्तन और अन्य वस्तुओं की खरीदारी को शुभ माना जाता है। इसके साथ ही धनिया के बीज और झाड़ू खरीदने की भी विशेष परंपरा है। इन मान्यताओं के पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व जुड़ा हुआ है।

धनतेरस पर धनिया और झाड़ू खरीदने की परंपरा

धनतेरस पर साबुत धनिया खरीदना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धनिया के बीज अंकुरित होकर बढ़ते हैं, इसलिए इन्हें धन, समृद्धि और आमदनी में वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में देवी लक्ष्मी को अन्न और धान्य की वृद्धि करने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है। इसी मान्यता के चलते धनतेरस पर धनिया के साबुत बीज खरीदने की परंपरा प्रचलित है।

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वहीं, धनतेरस पर झाड़ू खरीदने का भी विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि, किसी प्रमुख धार्मिक ग्रंथ में झाड़ू खरीदने की इस परंपरा का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन लोकमान्यताओं में झाड़ू को घर से दरिद्रता, नकारात्मकता और दुखों को दूर करने का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि धनतेरस के दिन लोग नई झाड़ू खरीदकर घर में लाते हैं।

समुद्र मंथन से प्रकट हुईं देवी लक्ष्मी

श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित समुद्र मंथन की कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मंथन किया था। इस मंथन से अनेक दिव्य वस्तुएं और देव स्वरूप प्रकट हुए। इनमें सुरभि गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, चार दांतों वाला ऐरावत हाथी, कौस्तुभ और पद्मराग मणि, पारिजात वृक्ष तथा अप्सराएं शामिल थीं। अंत में देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं।

देवी लक्ष्मी के प्रकट होने पर इंद्र ने उन्हें आसन प्रदान किया। नदियां स्वर्ण कलशों में जल लेकर पहुंचीं, ऋषियों ने वैदिक मंत्रों के साथ उनका अभिषेक किया और दिशाओं के हाथियों ने देवी को स्नान कराया। इसके बाद देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना।

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समुद्र मंथन से जुड़ी इस कथा के कारण देवी लक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। धनतेरस और दीपावली पर लक्ष्मी पूजा की परंपरा इसी धार्मिक आस्था से जुड़ी है।

करीब 200 साल पहले भी होती थी सिक्कों की पूजा

धनतेरस पर धन की पूजा की परंपरा कितनी पुरानी है, इसका उल्लेख ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड की पुस्तक ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ में मिलता है। वर्ष 1832 में प्रकाशित इस पुस्तक के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को लोग सिक्कों को देवी लक्ष्मी का प्रतीक मानकर उनकी पूजा करते थे।

यह परंपरा विशेष रूप से व्यापारी समुदाय में प्रचलित थी। जेम्स टॉड ने 1818 से 1822 के बीच राजस्थान में राजपूताना की परंपराओं और रीति-रिवाजों का अध्ययन किया था। उनके विवरण से संकेत मिलता है कि करीब दो शताब्दी पहले भी धनतेरस पर धन और संपत्ति की पूजा का विशेष महत्व था।

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इस तरह धनतेरस केवल खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि धन, समृद्धि, शुभता और पारंपरिक आस्था से जुड़ा त्योहार भी है।