चंडीगढ़। एजेंसी। सुबह बच्चों को स्कूल भेजने से पहले दूध पिलाना हो या बुजुर्गों की दिनचर्या की शुरुआत दूध के गिलास से करना, दूध भारतीय घरों में रोजाना इस्तेमाल होने वाला प्रमुख खाद्य पदार्थ है। लेकिन पंजाब यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में दूध की शुद्धता को लेकर चिंता बढ़ाने वाला तथ्य सामने आया है। चंडीगढ़ में जांचे गए दूध के आठ नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक यानी प्लास्टिक के बेहद छोटे कण पाए गए। इनकी संख्या प्रति लीटर 98 से 269 तक दर्ज की गई।

अध्ययन में बाजार में उपलब्ध तीन ब्रांड के दूध और फार्म से लिए गए कच्चे दूध के नमूने शामिल थे। शोधकर्ताओं के मुताबिक, कच्चे दूध के नमूने में भी सूक्ष्म प्लास्टिक कण मिले। इससे संकेत मिलता है कि दूध में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी केवल पैकेजिंग तक सीमित नहीं हो सकती। हालांकि, इन कणों के दूध में पहुंचने के वास्तविक स्रोत का पता लगाने के लिए आगे विस्तृत जांच की आवश्यकता है।

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यह शोध फरवरी 2026 में अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका *फूड एडिटिव्स एंड कंटैमिनेंट्स: पार्ट ए* में प्रकाशित हुआ। अध्ययन में पंजाब यूनिवर्सिटी के डॉ. एसएस भटनागर यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी तथा एनर्जी रिसर्च सेंटर से जुड़े शोधकर्ताओं ने भाग लिया। उन्होंने दूध में मौजूद सूक्ष्म कणों की पहचान के लिए कई वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया।

 दूध में मिले कई प्रकार के प्लास्टिक

अध्ययन के दौरान दूध के नमूनों में अलग-अलग आकार, रंग और प्रकार के कण पाए गए। वैज्ञानिकों ने पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी), पॉलीइथिलीन (पीई), पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी), पॉलीयूरेथेन (पीयू), पॉलीकार्बोनेट (पीसी), पीईवीए और पीएलए जैसे प्लास्टिक पॉलिमर की पहचान की। इसके अलावा रेयॉन और कॉटन के रेशे भी मिले।

माइक्रोप्लास्टिक पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कणों को कहा जाता है। इनमें से कई कण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें नंगी आंखों से देखना संभव नहीं होता। प्लास्टिक की वस्तुओं के टूटने, पैकेजिंग सामग्री और पर्यावरण में मौजूद अन्य स्रोतों से ये कण खाद्य पदार्थों तक पहुंच सकते हैं। दूध जैसे व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थ में इनकी मौजूदगी खाद्य गुणवत्ता की निगरानी को महत्वपूर्ण बनाती है।

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 कई वैज्ञानिक तकनीकों से की गई पहचान

शोधकर्ताओं ने दूध के नमूनों में मौजूद कणों की पहचान के लिए ऑप्टिकल माइक्रोस्कोप के साथ एफटीआईआर और रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी तकनीकों का उपयोग किया। एसएफईसी नामक गणना पद्धति के जरिए कणों के स्पेक्ट्रम का उपलब्ध डाटाबेस से मिलान किया गया। वहीं, एफईएसईएम-ईडीएक्स तकनीक से कणों की संरचना और उनमें मौजूद तत्वों से जुड़ी विशेषताओं का विश्लेषण किया गया।

इन तकनीकों को एक साथ इस्तेमाल करने का उद्देश्य कणों की पहचान को अधिक विश्वसनीय बनाना था। अध्ययन में अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक पॉलिमर की मौजूदगी दर्ज की गई, जिससे दूध की गुणवत्ता की जांच में आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों की उपयोगिता भी सामने आई।

 उत्पादन से पैकेजिंग तक जांच की जरूरत

दूध बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों के आहार का अहम हिस्सा है। ऐसे में इसमें माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी सामने आना खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता की निगरानी के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस अध्ययन से यह स्पष्ट नहीं होता कि कण दूध में किस चरण पर पहुंचे। इसके लिए पशुपालन, दूध निकालने, संग्रहण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और परिवहन की अलग-अलग जांच करनी होगी।

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विशेषज्ञों के मुताबिक, अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज की गई है, लेकिन इससे अकेले यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दूध में मौजूद इन कणों से स्वास्थ्य पर कितना या किस प्रकार का प्रभाव पड़ता है। इसके लिए व्यापक शोध और दीर्घकालिक अध्ययन जरूरी हैं।

 लोगों को जागरूक करने में अहम अध्ययन

डॉ. एसएस भटनागर यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी तथा एनर्जी रिसर्च सेंटर की चेयरपर्सन प्रो. अनुपमा ठाकुर के अनुसार, यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आम लोगों को रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक की संभावित मौजूदगी के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है।

उन्होंने कहा कि लोगों के लिए यह जानना जरूरी है कि जिन खाद्य पदार्थों को वे सुरक्षित मानकर इस्तेमाल करते हैं, उनमें भी सूक्ष्म प्लास्टिक कण हो सकते हैं। यह अध्ययन इस अनदेखे पहलू के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में अहम कदम है।

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