आज स्मार्टफोन पर QR कोड स्कैन करते ही ट्रेन की यात्रा शुरू हो जाती है। लेकिन दो-तीन दशक पहले की बात करें तो रेलवे स्टेशन पर मोटे पीले या भूरे कार्डबोर्ड टिकट मिला करते थे। ये टिकट काफी मजबूत होते थे। सफर के दौरान जब टीटीई या टिकट कलेक्टर आते, तो अपने पास की पंच मशीन से टिकट में साफ छेद कर देते थे।

ज्यादातर मुसाफिर इसे छपाई की प्रक्रिया या कोई डिजाइन समझते थे। असल में इन छोटे-छोटे छेदों के पीछे रेलवे की सुरक्षा और प्रबंधन का पूरा गणित छिपा था।

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छेद करने का मुख्य मकसद क्या था?

सबसे बड़ा काम था धोखाधड़ी रोकना। एक बार टिकट में छेद हो जाने का मतलब था कि इस टिकट की जांच हो चुकी है और यात्रा वैध हो चुकी है। अब कोई शातिर मुसाफिर इसे किसी और को दोबारा सफर कराने के लिए नहीं दे सकता था।

टिकट पंच करने से टिकट इस्तेमाल हो चुका माना जाता था। यह तरीका दुनिया भर की कई रेलवे में चलता था, भारत में भी दशकों तक यही व्यवस्था रही। एडमंडसन स्टाइल के कार्डबोर्ड टिकट 1830 के दशक में ब्रिटेन में शुरू हुए थे और बाद में भारत समेत कई देशों में अपनाए गए।

कई जगहों पर टीटीई के पास अलग-अलग आकार के पंच होते थे। छेद का निशान देखकर पता चल जाता था कि किसने चेक किया है। इससे बाद में कोई विवाद होने पर भी आसानी से पता लग जाता था।

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छेद की जगह से रूट और समय की निगरानी भी होती थी

केवल धोखाधड़ी रोकना ही नहीं, छेद की जगह या पैटर्न से भी जानकारी मिलती थी। कुछ डिवीजनों में टिकट के किस हिस्से में छेद किया गया है, इससे स्टाफ को तुरंत समझ आ जाता था कि यह टिकट किस स्टेशन या किस हिस्से में चेक हुआ है। बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के यह काम हो जाता था।

भीड़ भरे जनरल कोच में गर्मी के दिन की कल्पना कीजिए। टीटीई धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, चार्ट हाथ में, पंच बेल्ट से लटक रहा है। आपका टिकट देखता है, पंच को सही जगह लगाता है और एक तेज धातु की आवाज के साथ छेद हो जाता है। छोटा सा कार्डबोर्ड का टुकड़ा नीचे गिरता है। अब आपका टिकट यात्रा का प्रमाण बन चुका है।

यह मैनुअल तरीका क्यों खत्म हो गया?

समय बदला। भारतीय रेलवे ने 1980 के दशक के मध्य में पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम (PRS) शुरू किया। उसके बाद थर्मल पेपर पर छपे टिकट आने लगे। कंप्यूटर में सारी जानकारी सेव होने लगी। अब भौतिक छेद की जरूरत नहीं रही।

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फिर मोबाइल ऐप, UTS, QR कोड और डिजिटल वेरिफिकेशन ने पूरी व्यवस्था बदल दी। आज ज्यादातर यात्री बिना कागज के टिकट लेकर सफर करते हैं। एडमंडसन कार्डबोर्ड टिकट मुख्य लाइनों से लगभग गायब हो चुके हैं, लेकिन कुछ हेरिटेज लाइनों जैसे नीलगिरी माउंटेन रेलवे पर अभी भी देखे जा सकते हैं। वहां पुरानी यादों के लिए यह सिस्टम चलता है।

पुराने टिकटों पर बने छेद आज भी कई परिवारों की यादों में जिंदा हैं। कलेक्टर इन टिकटों को संजोकर रखते हैं। हर छेद एक खास यात्रा, एक खास टीटीई और उस जमाने की कहानी सुनाता है जब एक साधारण धातु का पंच पूरे सिस्टम को संभाल रहा था।

तकनीक ने इसे और तेज और आसान बना दिया। लेकिन उस पुराने सिस्टम की सादगी और विश्वसनीयता आज भी लोगों को याद आती है।

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यह लेख 2 जुलाई 2026 तक पूरी तरह फैक्ट-चेक किया गया है। सारी जानकारी भारतीय रेलवे के इतिहास, एडमंडसन टिकट प्रणाली और कंप्यूटराइजेशन के रिकॉर्ड पर आधारित है।