बीजापुर/सुकमा। नक्सलवाद के कारण करीब 25 साल तक बंद रही कुचनूर की कोरंडम खदान एक बार फिर चर्चा में है। फरवरी 2025 में दोबारा शुरू हुई खदान से अब तक करीब 240 किलो कोरंडम निकाला जा चुका है। इसमें से 157.643 किलो कोरंडम का परिवहन किया गया है। अब सरकार की योजना इसे केवल कच्चे खनिज के रूप में बेचने के बजाय बस्तर की पहचान से जोड़कर ‘बस्तर ब्रांड’ के रूप में विकसित करने की है।

सरकार कोरंडम की पहचान से लेकर उसकी कटिंग, पॉलिशिंग, आभूषण निर्माण और मार्केटिंग तक की पूरी वैल्यू चेन बस्तर में विकसित करने की तैयारी कर रही है। इसी दिशा में छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) और पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के बीच समझौता भी हुआ है। सरकार के अनुसार खनन शुरू होने के बाद अब तक 14 स्थानीय युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ा गया है।

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बी-ग्रेड और औद्योगिक ग्रेड में निकला खनिज

अब तक परिवहन किए गए 157.643 किलो कोरंडम में 107.989 किलो बी-ग्रेड और 49.654 किलो औद्योगिक ग्रेड का है। खदान का क्षेत्र करीब 3.70 हेक्टेयर में फैला है। परियोजना को सालाना एक टन कोरंडम उत्पादन की पर्यावरणीय स्वीकृति मिली है।

कोरंडम को बहुमूल्य रत्नों की श्रेणी में रखा जाता है। यह एल्यूमीनियम ऑक्साइड का प्राकृतिक क्रिस्टलीय खनिज है। इसकी कठोरता काफी अधिक होती है और मोह्स पैमाने पर यह हीरे के बाद दूसरा सबसे कठोर प्राकृतिक खनिज माना जाता है।

सीएमडीसी और निजी कंपनी का संयुक्त उपक्रम

कुचनूर खदान का संचालन छत्तीसगढ़ कोरंडम माइन्स लिमिटेड कर रही है। यह सीएमडीसी और मेसर्स एनसी नाहर का संयुक्त उपक्रम है। खदान के दोबारा शुरू होने के बाद सरकार इसे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के नए अवसरों से जोड़ने पर जोर दे रही है।

सरकार की मंशा है कि बस्तर में ही कोरंडम की पहचान, प्रोसेसिंग और मूल्यवर्धन का काम हो, ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ें और खनिज से होने वाला आर्थिक लाभ क्षेत्र को भी मिले।

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विधायक मंडावी ने ग्रामसभा की प्रक्रिया पर उठाए सवाल

हालांकि परियोजना को लेकर बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि खनन शुरू करने से पहले कुचनूर में ग्रामसभा नहीं बुलाई गई और ग्रामीणों की सहमति नहीं ली गई। उनका कहना है कि बीजापुर अनुसूचित क्षेत्र है और यहां पेसा कानून लागू है। ऐसे में ग्रामसभा की भूमिका को नजरअंदाज कर खनन आगे बढ़ाना नियमों के अनुरूप नहीं है।

मंडावी ने प्रशासन के करीब 14 साल पुराने प्रस्ताव को वर्तमान ग्रामसभा की सहमति का विकल्प मानने पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने कुचनूर में ग्रामसभा बुलाकर खनन से जुड़ी पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कराने की मांग की है।

पेड़ों की कटाई को लेकर भी विवाद

खदान क्षेत्र में पेड़ों की कटाई को लेकर भी वर्ष 2025 में सवाल उठ चुके हैं। विधानसभा में पेड़ों की कटाई और उससे संबंधित अनुमति को लेकर प्रश्न उठाया गया था। विपक्षी कांग्रेस ने परियोजना को लेकर निजी हाथों में सौंपे जाने की आशंका भी जताई है।

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ऐसे में कुचनूर के कोरंडम की चमक के साथ सरकार के सामने बड़ी चुनौती यह भी है कि खनन से जुड़े ग्रामसभा, पर्यावरण और स्थानीय सहमति के सवालों का समाधान किया जाए। यदि खनन और स्थानीय हितों के बीच संतुलन कायम होता है, तो कोरंडम बस्तर में रोजगार और मूल्यवर्धन की नई राह खोल सकता है।