भूटान के उत्तर-पश्चिमी गासा जिले में स्थित शिंताफू झील से अचानक पानी का तेज बहाव शुरू होने के बाद बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई है। यह झील मो छू नदी के उद्गम स्थल पर स्थित है और भूटान की 17 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलों में शामिल है। इससे पहले वर्ष 2021 में भी इस इलाके में बाढ़ की घटना सामने आई थी। इस बार की घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की आशंका से जोड़कर देखा जा रहा है।

घटना की गंभीरता को देखते हुए पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती इलाकों में अलर्ट जारी किया गया है। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले खतरे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। आखिर GLOF क्या होता है, यह कैसे आता है और इससे कितना नुकसान हो सकता है? आइए समझते हैं।

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 क्या होती हैं ग्लेशियल झीलें?

ग्लेशियल लेक यानी हिमनदीय झीलें। ये झीलें ग्लेशियरों के पिघलने से निकलने वाले पानी के जमा होने से बनती हैं। जब पहाड़ों पर मौजूद ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघलते हैं, तो उनका पानी आसपास के निचले इलाकों और पहाड़ों के बीच बने गड्ढों में इकट्ठा होने लगता है।

 

कई बार ग्लेशियर अपने साथ मिट्टी, पत्थर और चट्टानों का मलबा बहाकर लाते हैं। यह मलबा प्राकृतिक बांध का रूप ले लेता है। इसके पीछे पानी जमा होने से झील बन जाती है। हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में इस तरह की झीलें बड़ी संख्या में देखने को मिलती हैं।

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### क्या होता है ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF)?

 

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ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF एक ऐसी अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ है, जो ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों का पानी प्राकृतिक बांध टूटने या उसके ऊपर से बहने के कारण बाहर निकलने से आती है।

 

ग्लेशियल झीलों के किनारे अक्सर बर्फ, मिट्टी और पत्थरों से बने प्राकृतिक बांध होते हैं। ये बांध कंक्रीट की मजबूत दीवारों की तरह नहीं होते, इसलिए इनके कमजोर होने या टूटने का खतरा बना रहता है। जब अचानक झील का पानी बाहर निकलता है, तो वह बेहद तेज रफ्तार से पहाड़ों से नीचे की ओर बहता है।

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 आखिर कैसे टूटते हैं ग्लेशियल झीलों के बांध?

ग्लेशिय झीलों के बांध टूटने के पीछे कई कारण हो सकते हैं।

1\. ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना: तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, जिससे झील में पानी का स्तर बढ़ जाता है और बांध पर दबाव पड़ता है।

2\. भूस्खलन और हिमस्खलन: आसपास की पहाड़ियों से बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टानें और मिट्टी झील में गिर सकती हैं। इससे पानी में अचानक विशाल लहरें उठती हैं।

3\. प्राकृतिक बांध का कमजोर होना: लगातार पानी का दबाव बढ़ने से मिट्टी, पत्थर और बर्फ से बना प्राकृतिक बांध कमजोर होकर टूट सकता है

4\. बांध के ऊपर से पानी बहना: झील में पानी का स्तर अचानक बढ़ने पर पानी बांध के ऊपर से बहने लगता है। इससे बांध का कटाव तेज हो सकता है और वह टूट सकता है।

बाध टूटते ही पानी अपने साथ बड़े-बड़े पत्थर, मिट्टी और मलबा लेकर निचले इलाकों की ओर तेजी से बढ़ता है। इसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा GLOF का खतरा

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। इनके पिघलने से नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं और पहले से मौजूद झीलों का आकार भी बढ़ रहा है।

ऐसी झीलों में जमा पानी यदि अचानक बाहर निकल जाए, तो निचले इलाकों में भारी तबाही मचा सकता है। इससे जनहानि के साथ-साथ सड़कें, पुल, मकान और अन्य बुनियादी सुविधाएं भी बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं।

 हिमालय में कितनी ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं?

हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते खतरे को समझने के लिए नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने वर्ष 2011 से 2015 के बीच एक सर्वे किया था। यह अध्ययन केंद्रीय जल आयोग (CWC) के क्लाइमेट चेंज डायरेक्टरेट के सहयोग से पूरा किया गया था।

इस सर्वे में सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में मौजूद ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की पहचान की गई थी। सर्वे के अनुसार:

सिंधु नदी बेसिन: 352 झीलें और जल निकाय।

गंगा नदी बेसिन: 283 झीलें और जल निकाय।

ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन: 1,393 झीलें और जल निकाय।

इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों की निगरानी कितनी जरूरी है। खासकर ब्रह्मपुत्र बेसिन में इनकी बड़ी संख्या भविष्य में संभावित खतरों को लेकर चिंता बढ़ाती है।

GLOF के खतरे को कैसे कम किया जा सकता है?

ग्लेशियल झीलों से होने वाली संभावित तबाही को रोकने के लिए समय रहते खतरे की पहचान करना बेहद जरूरी है। इसके लिए NDMA ने सैटेलाइट तकनीक और आधुनिक निगरानी प्रणालियों के इस्तेमाल पर जोर दिया है।

सैटेलाइट निगरानी: सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) इमेजरी की मदद से झीलों के आकार और उनमें होने वाले बदलावों पर नजर रखी जा सकती है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम: संवेदनशील इलाकों में समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।

नियमित सर्वेक्षण: नई ग्लेशियल झीलों के बनने और पुरानी झीलों के बढ़ते आकार की लगातार निगरानी जरूरी है।

आपदा प्रबंधन की तैयारी: निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए प्रभावी योजना तैयार होनी चाहिए।

NDMA का सुझाव है कि सालभर सैटेलाइट के जरिए ग्लेशियल झीलों की निगरानी की व्यवस्था विकसित की जाए, ताकि संभावित खतरे का पहले ही पता लगाया जा सके।

 क्यों गंभीर है हिमालयी क्षेत्रों के लिए यह खतरा?

भूटान की शिंताफू झील से पानी के अचानक तेज बहाव की घटना ने एक बार फिर साबित किया है कि ग्लेशियल झीलें केवल पहाड़ी क्षेत्रों के लिए ही नहीं, बल्कि उनसे निकलने वाली नदियों के निचले इलाकों के लिए भी खतरा बन सकती हैं। GLOF जैसी घटनाएं कुछ ही समय में बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में वैज्ञानिक निगरानी, समय पर चेतावनी और मजबूत आपदा प्रबंधन ही इससे होने वाले नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।