बिलासपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के दो दिवसीय बिलासपुर दौरे के दौरान संगठनात्मक विस्तार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों से जुड़े विवाद, सामाजिक समरसता, राष्ट्र रक्षा और युवाओं को संघ से जोड़ने जैसे अहम विषयों पर चर्चा हुई। बिलासपुर के कोनी में आयोजित बैठकों में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने विभिन्न समकालीन मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। संगठनात्मक पुनर्गठन और यूजीसी के नए प्रावधानों को लेकर हुई चर्चा विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही।

यूजीसी के नए नियमों पर सामाजिक असंतोष की समीक्षा

संघ सूत्रों के अनुसार, बैठकों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों की रक्षा के लिए लाए गए यूजीसी के नए नियमों पर चर्चा हुई। इन प्रावधानों को लेकर उठ रहे सामाजिक और राजनीतिक सवालों तथा विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रियाओं पर भी विचार किया गया।

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नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों और शिक्षकों के एक वर्ग ने शिकायतों के निपटारे में निष्पक्षता तथा कथित फर्जी शिकायतों से बचाव के पर्याप्त प्रावधानों की मांग उठाई है। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में इन नियमों के विरोध में प्रदर्शन और महापंचायतें आयोजित किए जाने की खबरें सामने आई हैं।

सूत्रों के मुताबिक, संघ नेतृत्व ने इस मुद्दे पर प्रदेश के वरिष्ठ पदाधिकारियों से राय ली। हालांकि, बैठकों में लिए गए निर्णयों या यूजीसी के नियमों को लेकर संघ के किसी औपचारिक आधिकारिक बयान की पुष्टि नहीं हुई है।

संगठनात्मक पुनर्गठन की तैयारी, दिसंबर में हो सकता है फैसला

छत्तीसगढ़ में संगठन के विस्तार और कामकाज को अधिक प्रभावी बनाने के लिए संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की संभावना पर भी चर्चा हुई। संघ सूत्रों के अनुसार, राज्य को संगठनात्मक दृष्टि से दो अलग-अलग प्रांतों में विभाजित करने की योजना पर विचार किया जा रहा है। इस संबंध में दिसंबर में प्रस्तावित प्रांतीय बैठक में औपचारिक निर्णय लिया जा सकता है।

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प्रस्तावित व्यवस्था के तहत बिलासपुर और रायपुर को केंद्र में रखकर दो संगठनात्मक इकाइयां बनाने की रूपरेखा पर चर्चा हुई है। इसमें बिलासपुर इकाई के अंतर्गत रायगढ़, अंबिकापुर और कोरबा को शामिल करने का प्रस्ताव बताया जा रहा है। वहीं, रायपुर इकाई में रायपुर के साथ बस्तर, राजिम, राजनांदगांव और भिलाई-दुर्ग क्षेत्र को रखने की योजना है।

दोनों इकाइयों के लिए अलग-अलग संभाग संघचालक नियुक्त किए जाने की संभावना भी जताई गई है। हालांकि, प्रस्तावित क्षेत्रों की अंतिम सीमाओं और संगठनात्मक व्यवस्था पर आधिकारिक निर्णय होना बाकी है। माना जा रहा है कि इस तरह के पुनर्गठन से वनवासी क्षेत्रों और दूरदराज के इलाकों में संगठन की गतिविधियों के समन्वय को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

शताब्दी वर्ष पर भव्य आयोजन की तैयारी

संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों को लेकर भी बैठक में विचार-विमर्श किया गया। छत्तीसगढ़ में बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करने की योजना पर चर्चा हुई है। आयोजन की तारीख, स्थान और स्वरूप को लेकर अंतिम घोषणा बाद में किए जाने की संभावना है।

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इसी सिलसिले में दिसंबर में डॉ. मोहन भागवत का एक बार फिर छत्तीसगढ़ दौरा प्रस्तावित बताया जा रहा है। हालांकि, उनके अगले दौरे की तारीख और कार्यक्रम की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

संत समाज, राष्ट्र रक्षा और युवाओं पर भी चर्चा

दो दिवसीय बैठकों में सामाजिक और वैचारिक विषयों के साथ राष्ट्र रक्षा, संत समाज की भूमिका तथा युवा पीढ़ी को संघ से जोड़ने की रणनीति पर भी चर्चा हुई। सनातन संस्कृति के संरक्षण, सामाजिक समरसता बनाए रखने और संत समाज के सामने मौजूद चुनौतियों पर विचार किया गया।

तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच युवाओं को वैचारिक रूप से जोड़ने और संघ की शाखाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए कार्ययोजना तैयार करने पर भी जोर दिया गया। बैठकों के दौरान गोपनीयता और अनुशासन का विशेष ध्यान रखा गया। सूत्रों के मुताबिक, परिसर में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध था।

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वरिष्ठ पदाधिकारी रहे मौजूद

बैठकों में प्रांत संघचालक डॉ. पूर्णेन्दु सक्सेना, टोप लाल वर्मा, स्वप्निल कुलकर्णी, अभय राम और नारायण नामदेव सहित आरएसएस तथा उससे जुड़े विभिन्न आनुषांगिक संगठनों के वरिष्ठ प्रांतीय पदाधिकारी मौजूद रहे।

भागवत के इस दौरे में संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक मुद्दों पर हुई चर्चाओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, यूजीसी के नियमों पर संघ का औपचारिक रुख, छत्तीसगढ़ में दो प्रांतों के गठन और दिसंबर में होने वाले संभावित कार्यक्रमों के संबंध में अंतिम स्थिति आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।