रायपुर । छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं और आस्था से जुड़ा कमरछठ पर्व आज श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना को लेकर माताएं इस दिन कठिन व्रत रखती हैं। इस पर्व की सबसे खास बात यह है कि इसकी पूजा-पद्धति और खान-पान में कई ऐसी परंपराएं शामिल हैं, जो इसे अन्य व्रत-त्योहारों से अलग पहचान देती हैं।

लोकआस्था में गहराई से जुड़ा है यह पर्व

कमरछठ को भगवान बलराम से भी जोड़कर देखा जाता है। ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रों में इस दिन माताएं विशेष पूजा-अर्चना करती हैं और अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य तथा दीर्घायु की कामना करती हैं। व्रत के दौरान कई प्रकार के अनाज और सामान्य भोजन से परहेज किया जाता है।

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पसहर चावल से पूरी होती है व्रत की परंपरा

कमरछठ के अवसर पर पसहर चावल का विशेष महत्व माना जाता है। इसे सामान्य धान की तरह खेतों में तैयार नहीं किया जाता, बल्कि प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाला चावल माना जाता है। व्रत के बाद इसी चावल से तैयार भोजन ग्रहण करने की परंपरा कई स्थानों पर आज भी निभाई जाती है।

छह भाजियों की थाली क्यों है खास?

इस पर्व पर भोजन में छह प्रकार की भाजियों को शामिल करने की परंपरा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इन भाजियों का सेवन कमरछठ की पूजा-विधि का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यही वजह है कि पर्व के दिन बाजारों में पारंपरिक साग-सब्जियों की मांग भी बढ़ जाती है।

एक खास मिर्च का भी होता है इस्तेमाल

कमरछठ से जुड़ी स्थानीय परंपराओं में ‘अंग्रेजी मिर्च’ का भी उल्लेख मिलता है। इसे लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। कई परिवारों में इसे पर्व के पारंपरिक भोजन का हिस्सा माना जाता है और पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी निभाया जाता है।

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सगरी पूजा के बिना अधूरा माना जाता है आयोजन

कमरछठ की पूजा में सगरी का विशेष स्थान होता है। घर या पूजा स्थल पर सगरी तैयार कर उसके आसपास पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना की जाती है। महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा में शामिल होती हैं और परिवार तथा बच्चों की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं।

हर जगह नजर आता है ‘छह’ का खास जुड़ाव

कमरछठ की कई रस्मों में संख्या छह का विशेष महत्व दिखाई देता है। छह भाजियां, पूजा से जुड़ी विभिन्न वस्तुएं और पारंपरिक मान्यताएं इस पर्व की विशिष्ट पहचान बनाती हैं। यही वजह है कि कमरछठ को लोकजीवन में अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान वाला पर्व माना जाता है।

बच्चों के लिए भी निभाई जाती है खास रस्म

कमरछठ के दिन कई परिवारों में बच्चों की पीठ पर ‘पीली पोती’ लगाने की परंपरा भी है। इसे माताओं के आशीर्वाद और बच्चों की रक्षा से जुड़ी लोकमान्यता के रूप में देखा जाता है। पूजा और व्रत के बाद परिवार के सदस्य इस रस्म को पारंपरिक तरीके से पूरा करते हैं।

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नई पीढ़ी तक पहुंच रही पुरखों की परंपरा

कमरछठ केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, पारिवारिक आस्था और मातृत्व भावनाओं से जुड़ा पर्व है। बदलते समय के बावजूद ग्रामीण अंचलों से लेकर शहरों तक अनेक परिवार इस पर्व की पारंपरिक मान्यताओं को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं। यही परंपराएं छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।