नई दिल्ली। एजेंसी। यूपीआई से 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने की प्रस्तावित व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस संबंध में जनहित याचिका दाखिल कर नई शुल्क व्यवस्था को मनमानी और भेदभावपूर्ण बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि इससे देशभर के कारोबारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।

याचिका में 14 सितंबर 2026 की राजपत्र अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित MDR व्यवस्था को चुनौती दी गई है। नई व्यवस्था 15 अक्टूबर से लागू करने का प्रस्ताव है।

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2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 0.4% MDR

अधिवक्ता अंजन दत्ता ने अधिवक्ता आशुतोष दुबे के माध्यम से यह याचिका दाखिल की है। इसमें कहा गया है कि 2,000 रुपये से अधिक के कुछ व्यक्ति-से-व्यापारी (P2M) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाया जाएगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये रखी गई है।

रेलवे, दूरसंचार, बीमा और ईंधन जैसी कुछ श्रेणियों के लिए अलग शुल्क दर का प्रावधान किया गया है। इन क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर पांच रुपये की एकसमान दर लागू होने की बात कही गई है।

2,000 रुपये की सीमा पर उठाए सवाल

याचिकाकर्ता ने नई व्यवस्था में तय अलग-अलग सीमाओं और श्रेणियों के आधार पर सवाल उठाए हैं। याचिका में 2,000 रुपये की सीमा, हर महीने एक लाख रुपये तक यूपीआई प्राप्त करने वाली श्रेणी, अलग-अलग क्षेत्रों के लिए शुल्क दर और 75,000 रुपये की अधिकतम सीमा के आधार पर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

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याचिका के मुताबिक, 2,001 रुपये के लेनदेन पर प्रतिशत के आधार पर शुल्क लग सकता है, जबकि 2,000 रुपये के लेनदेन पर ऐसा शुल्क नहीं लगेगा। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस तरह की सीमा समान स्थिति वाले कारोबारियों के बीच अलग व्यवहार का आधार बन सकती है।

याचिका में यूपीआई व्यवस्था की सुरक्षा और मजबूती के उद्देश्य पर सवाल नहीं उठाया गया है। हालांकि, शुल्क लगाने की प्रक्रिया और इसके लिए अपनाए गए आधार को पर्याप्त रूप से सार्वजनिक नहीं किए जाने का आरोप लगाया गया है।

सरकार ने कहा- फैसला वापस लेने का सवाल नहीं

सरकार ने बुधवार को स्पष्ट किया कि 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाने के फैसले पर पुनर्विचार या इसे वापस लेने का फिलहाल कोई सवाल नहीं है। एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने कहा कि इस संबंध में फैसला लिया जा चुका है।

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आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, बड़े यूपीआई भुगतान हासिल करने वाले कारोबारियों पर MDR लगाने का फैसला यूपीआई पारिस्थितिकी तंत्र के हित में तथा इसकी सुरक्षा और संरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि कई अन्य देशों में भी डिजिटल भुगतान के लिए शुल्क व्यवस्था लागू है और नई MDR व्यवस्था यूपीआई को वित्तीय रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर सकती है।

हालांकि, इस फैसले का व्यापारियों, दुकानदारों और कुछ राजनीतिक दलों की ओर से विरोध किया गया है। विपक्षी दलों ने भी इस व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं।

MDR पर 18% GST भी

नई व्यवस्था के तहत 15 अक्टूबर से बड़े यूपीआई भुगतान पर लगने वाले MDR पर 18 प्रतिशत की दर से GST भी लगेगा। कर विशेषज्ञों के अनुसार, GST-पंजीकृत कारोबारी इस कर का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) लेने के पात्र हो सकते हैं।

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प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के पात्र यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR लगेगा और इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी। कुछ निर्धारित क्षेत्रों में अलग शुल्क व्यवस्था लागू होगी।