रायपुर। छत्तीसगढ़ के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में फर्जी जाति प्रमाण पत्र से जुड़े एक मामले में कार्रवाई की धीमी रफ्तार अब सवालों के घेरे में है। उच्च स्तरीय छानबीन समिति द्वारा मुख्य अभियंता केके कटारे का जाति प्रमाण पत्र अवैध घोषित किए जाने के करीब छह माह बाद भी विभाग हाईकोर्ट से मिले स्टे को हटाने के लिए प्रभावी पैरवी नहीं कर पाया है। इस बीच मामले में विभाग की ओर से नियुक्त ओआईसी मुख्य अभियंता रामसागर के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) आवेदन की तीन माह की निर्धारित अवधि भी आगामी 7 सितंबर को पूरी होने जा रही है। ऐसे में विभाग की कार्यवाही और उसकी मंशा को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

 

ये खबर भी पढ़ें…
भाजपा प्रदेश कार्यसमिति पर लगा ब्रेक, बूथों पर फोकस; मिशन-2028 की तैयारी तेज
भाजपा प्रदेश कार्यसमिति पर लगा ब्रेक, बूथों पर फोकस; मिशन-2028 की तैयारी तेज
रायपुर। भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के लिए पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को अभी और इंतजार करना पड़ेगा। राष्ट्रीय...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने 26 फरवरी 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए केके कटारे के जाति प्रमाण पत्र को अवैध घोषित किया था। इसके बाद कटारे ने हाईकोर्ट का रुख किया और छानबीन समिति के निर्णय के खिलाफ अंतरिम राहत हासिल कर ली। इसके बाद उम्मीद थी कि संबंधित विभाग न्यायालय में प्रभावी पक्ष रखते हुए स्टे हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा, लेकिन करीब छह माह गुजरने के बाद भी इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं होने की बात सामने आ रही है।

 

स्टे हटाने की कार्रवाई पर सवाल

ये खबर भी पढ़ें…
कांग्रेस की ‘जमीनी पाठशाला’ शुरू… ब्लॉक अध्यक्षों को सिखाए जाएंगे चुनावी सियासत के गुर
कांग्रेस की ‘जमीनी पाठशाला’ शुरू… ब्लॉक अध्यक्षों को सिखाए जाएंगे चुनावी सियासत के गुर
रायपुर/दुर्ग। छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने अब संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। बस्तर के...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

 

मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब छानबीन समिति पहले ही जाति प्रमाण पत्र को अवैध घोषित कर चुकी है, तो विभाग की ओर से हाईकोर्ट में स्टे हटाने के लिए अब तक क्या ठोस कार्रवाई की गई? विभाग की ओर से इस मामले में प्रभावी कानूनी पक्ष रखने और न्यायालय के समक्ष संबंधित दस्तावेज व तथ्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

 

ये खबर भी पढ़ें…
CG की पॉलिटिकल खबर: भगत की एंट्री से कांग्रेस में हलचल तेज, संगठन से सियासी समीकरण तक बड़े बदलाव के संकेत
CG की पॉलिटिकल खबर: भगत की एंट्री से कांग्रेस में हलचल तेज, संगठन से सियासी समीकरण तक बड़े बदलाव के संकेत
रायपुर। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने चुनावी तैयारियों के साथ संगठन को मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। प्रदेश...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

विभागीय स्तर पर यह चर्चा है कि यदि सरकार और संबंधित विभाग मामले को गंभीरता से लेते तो स्टे के खिलाफ प्रभावी पैरवी के साथ आगे की न्यायिक प्रक्रिया तेज की जा सकती थी। हालांकि, विभाग की ओर से जानबूझकर कोई तर्क प्रस्तुत नहीं किया गया या किसी अधिकारी को बचाने के लिए कार्रवाई धीमी की गई, इस तरह के दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन चर्चाओं को फिलहाल आरोप और अटकलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

 

> मामले में अब तक क्या हुआ?

ये खबर भी पढ़ें…
अफसरों की ‘रील पॉलिटिक्स’ पर लगेगी लगाम? सोशल मीडिया को लेकर नई आचार संहिता की तैयारी
अफसरों की ‘रील पॉलिटिक्स’ पर लगेगी लगाम? सोशल मीडिया को लेकर नई आचार संहिता की तैयारी
नई दिल्ली। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर केंद्र सरकार अब स्पष्ट नियम बनाने की तैयारी...
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

 

26 फरवरी 2026: उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने केके कटारे के जाति प्रमाण पत्र को अवैध घोषित किया।

इसके बाद: मुख्य अभियंता ने हाईकोर्ट का रुख कर समिति के फैसले के खिलाफ स्टे हासिल किया।

करीब 6 माह बाद: स्टे हटाने और विभागीय कार्रवाई को लेकर स्थिति अब भी सवालों में।

7 सितंबर 2026: OIC रामसागर के VRS आवेदन की तीन माह की अवधि पूरी होने की बात सामने आ रही है।

मुख्य सवाल: स्टे हटाने के लिए विभाग ने अब तक कितनी प्रभावी कानूनी कार्रवाई की?

 

 

 

OIC के VRS से बढ़ी मामले की पेचीदगी

 

इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। विभाग ने हाईकोर्ट में मामले की पैरवी और स्टे हटाने की प्रक्रिया के लिए मुख्य अभियंता रामसागर को OIC की जिम्मेदारी दी थी। लेकिन बताया जा रहा है कि रामसागर ने स्वयं VRS के लिए आवेदन किया हुआ है। उनके आवेदन की तीन माह की निर्धारित अवधि आगामी 7 सितंबर को पूरी हो रही है।

 

यदि उनका VRS आवेदन स्वीकार हो जाता है तो वे विभागीय जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस अधिकारी को मामले में विभाग की ओर से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है, उनके कार्यकाल की स्थिति स्पष्ट होने से पहले विभाग ने मामले को निर्णायक स्तर तक क्यों नहीं पहुंचाया।

 

विभागीय हलकों में इसे लेकर भी चर्चा है कि OIC के स्तर पर अब तक मामले में कितनी सक्रियता दिखाई गई और हाईकोर्ट में स्टे हटाने के लिए क्या कदम उठाए गए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

 

ट्राइबल विभाग की प्रक्रिया तेज, पंचायत विभाग पर सवाल

 

मामले से जुड़े जानकारों के अनुसार, जाति प्रमाण पत्र से संबंधित कार्रवाई में आदिवासी एवं संबंधित विभागीय स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है, लेकिन पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की तरफ से कार्रवाई अपेक्षाकृत धीमी रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

 

यही वजह है कि अब पूरे मामले को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली पर चर्चा शुरू हो गई है। सवाल यह भी है कि जब एक उच्च स्तरीय समिति का फैसला सामने आ चुका है और उसके खिलाफ न्यायालय से अंतरिम राहत मिली है, तो विभाग को अपने प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर आगे की कार्रवाई में कितनी तत्परता दिखानी चाहिए थी।

 

अधिकारी के प्रभाव को लेकर भी चर्चाएं

 

विभागीय गलियारों में केके कटारे के प्रभाव और लंबे प्रशासनिक कार्यकाल को लेकर भी चर्चाएं हैं। कुछ सूत्रों की ओर से दावा किया जा रहा है कि उनके प्रभाव के कारण अब तक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी। हालांकि, किसी राजनीतिक संरक्षण या सत्ता के दबाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन दावों को तथ्य के रूप में नहीं बल्कि आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

 

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जाति प्रमाण पत्र की वैधता से जुड़ा विवाद केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहता। यदि किसी सरकारी अधिकारी का प्रमाण पत्र सक्षम समिति द्वारा अवैध घोषित किया जाता है और मामला न्यायालय में लंबित है, तो विभाग की जिम्मेदारी होती है कि वह न्यायिक प्रक्रिया में अपना पक्ष मजबूती से रखे और न्यायालय के अंतिम निर्णय के अनुरूप आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करे।

 

क्या VRS और जाति मामले का कोई संबंध है?

 

रामसागर के VRS आवेदन को लेकर भी विभाग में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोगों का दावा है कि उनके VRS आवेदन के पीछे भी इस पूरे प्रकरण से जुड़ी परिस्थितियां हो सकती हैं। हालांकि, VRS आवेदन के वास्तविक कारण की कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, इसलिए इसे जाति प्रमाण पत्र मामले से जोड़ना फिलहाल अनुमान ही माना जाएगा।

 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 7 सितंबर को OIC की VRS अवधि पूरी होने से पहले विभाग स्टे हटाने और मामले को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाता है? यदि इस समय तक भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती है तो विभाग की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवाल और गहरे हो सकते हैं।

 

फिलहाल मामला हाईकोर्ट के स्टे के कारण न्यायिक प्रक्रिया में है। इसलिए जाति प्रमाण पत्र को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति न्यायालय के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी। वहीं विभाग के लिए चुनौती यह है कि वह न्यायालय में प्रभावी पैरवी के साथ अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी भी स्पष्ट रूप से निभाए।