रायपुर। छत्तीसगढ़ में निजी विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश तथा फीस निर्धारण की व्यवस्था को लेकर सरकारी विभागों और नियामक संस्थाओं के बीच मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। उच्च शिक्षा विभाग, तकनीकी शिक्षा विभाग, प्रवेश एवं फीस विनियामक समिति (AFRC) और छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग (CGPURC) की ओर से जारी पत्रों और प्रस्तावों ने प्रवेश प्रक्रिया को लेकर स्थिति को और पेचीदा बना दिया है।

 

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मामला केवल अलग-अलग निर्देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में यह सवाल है कि निजी विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के प्रवेश और फीस निर्धारण पर मौजूदा कानून लागू होगा या निजी विश्वविद्यालयों के लिए अलग व्यवस्था बनाई जाएगी। एक ओर तकनीकी शिक्षा विभाग मौजूदा अधिनियम के तहत प्रवेश प्रक्रिया संचालित करने और उसके नियमों का पालन करने पर जोर दे रहा है, वहीं दूसरी ओर निजी विश्वविद्यालयों के नियमन से जुड़े आयोग ने कानून में संशोधन की जरूरत बताई है। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग की ओर से भी संशोधन का प्रारूप आगे बढ़ाया गया है।

9 जून को तकनीकी शिक्षा विभाग ने जारी किया था निर्देश

पूरे विवाद की शुरुआत 9 जून 2026 को जारी एक पत्र से मानी जा रही है। संचालक, तकनीकी शिक्षा की ओर से प्रदेश के निजी शिक्षण संस्थानों को जारी पत्र में निजी विश्वविद्यालयों को भी शामिल करते हुए ‘छत्तीसगढ़ निजी व्यावसायिक शिक्षण संस्था (प्रवेश का विनियमन एवं शुल्क का निर्धारण) अधिनियम, 2008’ का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए गए थे। तकनीकी शिक्षा विभाग की इस व्यवस्था का मूल आधार यह था कि संबंधित निजी संस्थानों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के प्रवेश और शुल्क निर्धारण के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाए। यानी प्रवेश प्रक्रिया को निर्धारित नियमों और मेरिट व्यवस्था के अनुरूप संचालित करने पर जोर दिया गया।

27 दिन बाद CGPURC ने उठाया अलग व्यवस्था का मुद्दा

तकनीकी शिक्षा विभाग के निर्देश के करीब 27 दिन बाद 6 जुलाई 2026 को छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग ने उच्च शिक्षा विभाग के सचिव को पत्र भेजा। आयोग ने AFRC अधिनियम, 2008 में संशोधन की आवश्यकता जताते हुए निजी विश्वविद्यालयों के लिए अलग व्यवस्था बनाए जाने की बात कही। यहीं से मौजूदा व्यवस्था और प्रस्तावित बदलाव के बीच टकराव की स्थिति दिखाई देने लगी। एक तरफ तकनीकी शिक्षा विभाग मौजूदा कानून के तहत प्रवेश और शुल्क निर्धारण की व्यवस्था लागू करने पर जोर दे रहा था, तो दूसरी तरफ निजी विश्वविद्यालयों के नियमन से जुड़े आयोग का कहना था कि निजी विश्वविद्यालयों की प्रकृति और व्यवस्था को देखते हुए अलग प्रावधान की जरूरत है।

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28 जुलाई को उच्च शिक्षा विभाग ने भेजा संशोधन का प्रारूप

मामले में 28 जुलाई 2026 को एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। उच्च शिक्षा विभाग के अवर सचिव ने सचिव, तकनीकी शिक्षा विभाग को पत्र भेजकर AFRC अधिनियम, 2008 में संशोधन का प्रारूप हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में भेजा। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को और महत्वपूर्ण बना दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस व्यवस्था का प्रशासनिक क्रियान्वयन तकनीकी शिक्षा विभाग और AFRC से जुड़ा हुआ है, उसमें संशोधन की प्रक्रिया किस स्तर पर और किस अधिकार क्षेत्र के तहत आगे बढ़ाई जा रही है।

कानून एक, लेकिन रुख अलग-अलग

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल विभागों और नियामक संस्थाओं के बीच समन्वय का है। तकनीकी शिक्षा विभाग मौजूदा अधिनियम और नियमों के अनुपालन पर जोर दे रहा है। दूसरी ओर उच्च शिक्षा विभाग उसी कानूनी ढांचे में संशोधन की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है। वहीं CGPURC निजी विश्वविद्यालयों के लिए अलग नियामक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दे रहा है। ऐसे में AFRC, तकनीकी शिक्षा विभाग, उच्च शिक्षा विभाग और CGPURC के अधिकार क्षेत्र और आपसी समन्वय को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं दिखाई दे रही है। जब तक यह तय नहीं होता कि निजी विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के प्रवेश और फीस पर कौन-सी व्यवस्था प्रभावी होगी, तब तक संस्थानों और विद्यार्थियों के बीच असमंजस बना रहना स्वाभाविक है।

अगस्त बीत रहा, विद्यार्थी अब भी जवाब के इंतजार में

मामले की सबसे बड़ी चिंता विद्यार्थियों को लेकर है। अगस्त का आधा से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन प्रवेश प्रक्रिया को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है। खासकर वे विद्यार्थी प्रभावित हो सकते हैं, जो मेरिट के आधार पर निजी विश्वविद्यालयों या निजी संस्थानों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेना चाहते हैं। विद्यार्थियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि उन्हें किस प्रक्रिया के तहत आवेदन करना होगा, मेरिट किस आधार पर तैयार होगी और फीस का निर्धारण किस नियामक व्यवस्था के अनुसार किया जाएगा। विभागों और संस्थाओं के बीच चल रहे पत्राचार के कारण इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभी तक सामने नहीं आया है।

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निजी विश्वविद्यालयों के लिए अलग व्यवस्था की मांग क्यों?

CGPURC की ओर से निजी विश्वविद्यालयों के लिए अलग व्यवस्था की मांग के पीछे यह तर्क हो सकता है कि निजी विश्वविद्यालय सामान्य निजी व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों से अलग कानूनी और प्रशासनिक ढांचे में संचालित होते हैं। ऐसे में उनके लिए प्रवेश और शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया भी अलग तरीके से निर्धारित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।लेकिन दूसरी ओर तकनीकी शिक्षा विभाग का रुख मौजूदा अधिनियम के पालन पर आधारित है। यही अंतर अब विवाद का मुख्य बिंदु बन गया है। जब तक संशोधन को अंतिम रूप नहीं दिया जाता, तब तक मौजूदा कानून की स्थिति और प्रस्तावित नई व्यवस्था के बीच स्पष्टता जरूरी है।

अब सबसे बड़ा सवाल—कौन तय करेगा प्रवेश का नियम?

मामले में सबसे अहम प्रश्न अधिकार क्षेत्र का है। यदि मौजूदा अधिनियम लागू है तो निजी विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की प्रवेश और फीस व्यवस्था उसी के अनुसार चलनी चाहिए। यदि निजी विश्वविद्यालयों के लिए अलग व्यवस्था प्रस्तावित है, तो उसके लिए विधिवत संशोधन और स्पष्ट आदेश की आवश्यकता होगी। यानी विद्यार्थियों और संस्थानों को बीच में रखकर अलग-अलग स्तर से निर्देश जारी होने के बजाय एक स्पष्ट, एकीकृत और सार्वजनिक व्यवस्था सामने आना जरूरी है।

सरकार के सामने समन्वय की बड़ी चुनौती

तकनीकी शिक्षा एवं रोजगार विभाग के सचिव डॉ. बसवराजू एस. के अनुसार, राज्य के सभी निजी विश्वविद्यालयों को पत्र लिखकर तकनीकी पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए 2008 के अधिनियम के नियमों का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। अब निगाह इस बात पर है कि उच्च शिक्षा विभाग, तकनीकी शिक्षा विभाग, AFRC और CGPURC के बीच इस मुद्दे पर अंतिम समन्वय कैसे होता है। क्योंकि प्रवेश सत्र आगे बढ़ रहा है और विद्यार्थियों के लिए अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रहना उनके हित में नहीं है।

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फिलहाल पूरा विवाद एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूम रहा है—निजी विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का प्रवेश और फीस आखिर किस नियम से तय होगी? जब तक इस पर स्पष्ट निर्णय नहीं होता, विभागों के बीच जारी पत्राचार और प्रस्ताव विद्यार्थियों की उलझन को ही बढ़ाते रहेंगे।