नई दिल्ली। कर्मचारियों के प्रोविडेंट फंड (EPF) को लेकर 2026 की नई व्यवस्था में आपात स्थिति के लिए बड़ा प्रावधान किया गया है। महामारी, एंडेमिक या राष्ट्रीय आपदा जैसी असाधारण परिस्थितियों में केंद्र सरकार आदेश जारी कर कर्मचारी, नियोक्ता या दोनों के EPF योगदान को अधिकतम तीन महीने के लिए घटा या टाल सकती है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सभी कर्मचारियों की PF कटौती अपने-आप बंद हो जाएगी। सामान्य स्थिति में EPF का मौजूदा योगदान नियम जारी रहेगा। राहत तभी लागू होगी, जब केंद्र सरकार इस प्रावधान के तहत अलग से आदेश जारी करेगी।

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सैलरी पर क्या असर पड़ेगा?

यदि सरकार किसी आपदा के दौरान कर्मचारी का EPF योगदान घटाने का आदेश देती है, तो उस अवधि में वेतन से कम PF कटेगा और कर्मचारी की टेक-होम सैलरी बढ़ सकती है। उदाहरण के तौर पर, यदि सामान्य तौर पर किसी कर्मचारी के वेतन से हर महीने ₹6,000 EPF में जाते हैं और इसे घटाकर ₹5,000 कर दिया जाता है, तो तीन महीने तक हर महीने ₹1,000 अतिरिक्त राशि हाथ में आएगी।

लेकिन इसका दूसरा असर भी होगा। जितनी राशि EPF खाते में जमा नहीं होगी, उतनी रकम पर भविष्य में ब्याज और चक्रवृद्धि का लाभ नहीं मिलेगा। इसलिए तत्काल टेक-होम सैलरी बढ़ने के साथ लंबे समय में रिटायरमेंट फंड पर असर पड़ सकता है।

EPF का सामान्य योगदान कितना है?

Employees’ Provident Funds Scheme, 2026 के तहत सामान्य स्थिति में नियोक्ता का योगदान 12% और कर्मचारी का योगदान भी उसके बराबर 12% है। कुछ अधिसूचित श्रेणियों के प्रतिष्ठानों के लिए 10% की दर लागू है। नई आपातकालीन व्यवस्था सामान्य योगदान दर को स्थायी रूप से नहीं बदलती।

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पेंशन पर क्या असर पड़ेगा?

अगर सरकार केवल कर्मचारी के EPF योगदान को अस्थायी रूप से घटाती है, तो उस अवधि में PF खाते में कम राशि जमा होगी। इससे भविष्य की EPF बचत और उस पर मिलने वाले ब्याज पर असर पड़ सकता है। वहीं, अगर सरकार नियोक्ता के योगदान को भी घटाती या टालती है, तो इसका प्रभाव भी संबंधित आदेश की शर्तों पर निर्भर करेगा।

इसलिए कर्मचारियों को किसी भी आपातकालीन राहत के दौरान सरकारी आदेश की शर्तें देखनी होंगी—राहत किसे मिलेगी, योगदान घटेगा या सिर्फ टलेगा, कर्मचारी या नियोक्ता में से किसका हिस्सा प्रभावित होगा और यह व्यवस्था कितने समय तक लागू रहेगी।

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