वाशिंगटन। अमेरिकी अंतरिक्ष एवं उपग्रह सेवा कंपनी स्पेसएक्स के संस्थापक एलन मस्क ने भारत के दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाने के लिए अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की पैरवी की है। मस्क का कहना है कि देश के जिन क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी अभी भी कमजोर है, वहां स्टारलिंक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ‘डॉजडिजाइनर’ नाम के एक अकाउंट की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “भारत में सबसे कम सेवा वाले क्षेत्रों को स्टारलिंक से मदद मिलेगी, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।”

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दरअसल, डॉजडिजाइनर ने अपनी पोस्ट में भारत के दूरदराज के गांवों को सैटेलाइट इंटरनेट से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया था। पोस्ट में दावा किया गया कि मई 2026 तक भारत के 11,256 गांवों में 4जी सेवा उपलब्ध नहीं थी। वहीं, मार्च 2026 में देश में कुल इंटरनेट सब्सक्रिप्शन करीब 1.093 अरब थे, जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों की हिस्सेदारी करीब 44.087 करोड़ थी।

आंकड़ों के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 100 लोगों पर इंटरनेट सब्सक्रिप्शन घनत्व 48.31 था, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 126.80 रहा। इससे ग्रामीण और शहरी भारत के बीच डिजिटल कनेक्टिविटी के अंतर का अंदाजा लगाया जा सकता है।

भारत में सेवा शुरू करने की तैयारी

एलन मस्क की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब स्टारलिंक भारत में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने के लिए जरूरी नियामकीय मंजूरियां हासिल करने की कोशिश कर रही है। कंपनी का लक्ष्य विशेष रूप से उन इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाना है, जहां पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क या ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुंचाना मुश्किल है।

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हालांकि, स्टारलिंक के जेन-2 उपग्रह नेटवर्क से जुड़े पहले आवेदन को भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) ने खारिज कर दिया था। रिपोर्टों के मुताबिक, आवेदन में नेटवर्क की कुछ विशेषताओं और प्रस्तावित रेडियो फ्रीक्वेंसी को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं पाया गया था। जेन-2 प्रणाली में सीधे डिवाइस से उपग्रह संपर्क जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।

कैसे काम करती है स्टारलिंक सेवा?

स्पेसएक्स की स्टारलिंक सेवा निम्न-पृथ्वी कक्षा (LEO) में स्थापित हजारों उपग्रहों के नेटवर्क के जरिए इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराती है। इसका उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों में भी तेज इंटरनेट पहुंचाना है, जहां फाइबर नेटवर्क या मोबाइल टावर स्थापित करना कठिन और महंगा होता है।

यदि भारत में स्टारलिंक को सभी जरूरी नियामकीय मंजूरियां मिलती हैं, तो दूरदराज के गांवों, पहाड़ी क्षेत्रों और कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले इलाकों में डिजिटल सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में यह तकनीक अहम साबित हो सकती है।

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